आयुर्वेद और हमारा जीवन

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्

रविवार, 3 जुलाई 2016

अमृतवल्लरी

!!!---: अमृतवल्लरी :---!!!
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प्रयोज्य अंग - काण्ड

क्वाथ - ५०-१०० मिली

रस - १०-२५ मिली

चूर्ण - ३-५ ग्राम

सत्व - १-२ ग्राम


रस - तिक्त, कषाय

गुण - गुरु स्निग्ध

वीर्य - उष्ण

विपाल-मधुर

प्रभाव-त्रिदोषध्न

- गुडूची - व्याधियों से रक्षा करने वाली

- ज्वरादि - ज्वर का नाश करने वाली

- पित्तध्नी - पित्त का शमन करने वाली

- वातरक्तारि - वातरक्त को नष्ट करने वाली

- रसायनी - जरा नाशिनी विनाशिनी

इसके सत्व में मंद गुण पाया जाता है यह दोषशामक एवं पित्तनाशक है। स्निग्ध् उष्ण होने से वात, तिक्त-कषाय रसयुक्त होने से कपफ और वात का शमन करती है।



परिचय :----
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गिलोय (वैज्ञानिक नाम :---टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया Tinospora Cardifolia) की एक बहुवर्षिय लता होती है। इसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते हैं। आयुर्वेद में इसको कई नामों से जाना जाता है यथा अमृता, गुडुची, छिन्नरुहा, चक्रांगी, आदि। इसे अंग्रेजी में गुलंच कहते हैं। कन्नड़ में अमरदवल्ली , गुजराती में गालो , मराठी में गुलबेल , तेलगू में गोधुची ,तिप्प्तिगा , फारसी में गिलाई,तमिल में शिन्दिल्कोदी आदि नामों से जाना जाता है। गिलोय में 'बहुवर्षायु तथा अमृत के समान गुणकारी होने से इसका नाम अमृता है।' आयुर्वेद साहित्य में इसे ज्वर की महान औषधि माना गया है एवं जीवन्तिका नाम दिया गया है। गिलोय की लता जंगलों, खेतों की मेड़ों, पहाड़ों की चट्टानों आदि स्थानों पर सामान्यतः कुण्डलाकार चढ़ती पाई जाती है। नीम, आम्र के वृक्ष के आस-पास भी यह मिलती है। जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनाती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं। इस दृष्टि से नीम पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ औषधि मानी जाती है। इसका काण्ड छोटी अंगुली से लेकर अंगूठे जितना मोटा होता है। बहुत पुरानी गिलोय में यह बाहु जैसा मोटा भी हो सकता है। इसमें से स्थान-स्थान पर जड़ें निकलकर नीचे की ओर झूलती रहती हैं। चट्टानों अथवा खेतों की मेड़ों पर जड़ें जमीन में घुसकर अन्य लताओं को जन्म देती हैं।


बेल के काण्ड की ऊपरी छाल बहुत पतली, भूरे या धूसर वर्ण की होती है, जिसे हटा देने पर भीतर का हरित मांसल भाग दिखाई देने लगता है। काटने पर अन्तर्भाग चक्राकार दिखाई पड़ता है। पत्ते हृदय के आकार के, खाने के पान जैसे एकान्तर क्रम में व्यवस्थित होते हैं। ये लगभग 2 से 4 इंच तक व्यास के होते हैं। स्निग्ध होते हैं तथा इनमें 7 से 9 नाड़ियाँ होती हैं। पत्र-डण्ठल लगभग 1 से 3 इंच लंबा होता है। फूल ग्रीष्म ऋतु में छोटे-छोटे पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल भी गुच्छों में ही लगते हैं तथा छोटे मटर के आकार के होते हैं। पकने पर ये रक्त के समान लाल हो जाते हैं। बीज सफेद, चिकने, कुछ टेढ़े, मिर्च के दानों के समान होते हैं। उपयोगी अंग काण्ड है। पत्ते भी प्रयुक्त होते हैं।


ताजे काण्ड की छाल हरे रंग की तथा गूदेदार होती है। उसकी बाहरी त्वचा हल्के भूरे रंग की होती है तथा पतली, कागज के पत्तों के रूप में छूटती है। स्थान-स्थान पर गांठ के समान उभार पाए जाते हैं। सूखने पर यही काण्ड पतला हो जाता है। सूखे काण्ड के छोटे-बड़े टुकड़े बाजार में पाए जाते हैं, जो बेलनाकार लगभग 1 इंच व्यास के होते हैं। इन पर से छाल काष्ठीय भाग से आसानी से पृथक् की जा सकती है। स्वाद में यह तीखी होती है, पर गंध कोई विशेष नहीं होती। पहचान के लिए एक साधारण-सा परीक्षण यह है कि इसके क्वाथ में जब आयोडीन का घोल डाला जाता है तो गहरा नीला रंग हो जाता है। यह इसमें स्टार्च की उपस्थिति का परिचायक है। सामान्यतः इसमें मिलावट कम ही होती है, पर सही पहचान अनिवार्य है। कन्द गुडूची व एक असामी प्रजाति इसकी अन्य जातियों की औषधियाँ हैं, जिनके गुण अलग-अलग होते हैं।
गिलोय उच्च कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने के लिए, शर्करा का स्तर बनाए रखने में मदद करता है। यह शरीर को दिल से संबंधित बीमारियों से बचाए रखता है। इसकी तासीर गर्म होती है ।

गिलोय एक रसायन है, जो रक्तशोधक, ओजवर्धक, हृदय रोग नाशक, शोधनाशक और लिवर टॉनिक भी है । गिलोय शरीर में ग्लूकोज की ऑक्सीकरण दर को बढाती है और रक्त शुद्ध करती है ।

गिलोय के अवयव :-----
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एक ग्लूकोसाइड गिलोइन के कारण इसका स्वाद कडवा होता है । इसमें कोलम्बिन, टिनोस्पोरेसाइड, पामेटिन, बर्बोरिन डाइसैकेराइड, कोलीन तथा टीनोस्पोटिक एसिड पाए जाते हैं । ये सभी जैव सक्रिय पदार्थ हैं । इनकी पत्तियों में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, फॉस्फोरस तथा प्रोटीन पाया जाता है ।

यह त्रिदोषनाशक अर्थात् वात, कफ और पित्त नाशक होती है ।

बीमारी---- पित्त का संतुलन गडबडाने पर पीलिया, पेट के रोग जैसी कई परेशानियां सामने आती हैं । कफ का संतुलन बिगडे तो सीने में जकड़न, बुखार आदि दिक्कतें पेश आती हैं । वात [वायु] अगर असंतुलित हो गई तो गैस ,जोडों में दर्द ,शरीर का टूटना ,असमय बुढापा जैसी चीजें झेलनी पड़ती हैं ।

चिकित्सा--- अगर आप वातज विकारों से ग्रसित हैं तो गिलोय का पाँच ग्राम चूर्ण घी के साथ लीजिये । पित्त की बीमारियों में गिलोय का चार ग्राम चूर्ण गुड या मिस्री के साथ खा लें तथा अगर आप कफ से संचालित किसी बीमारी से परेशान हो गए है तो इसे छः ग्राम की मात्रा में शहद के साथ खाएँ ।

घी के साथ यह वातदोष, मिस्री के साथ पित्तदोष तथा शहद के साथ कफ दोष का निवारण करती है।

इसमें एण्टीवायरल और एण्टीबायोटिक तत्त्व भी होते हैं । यह शरीर में इंसुलिन उत्पादन क्षमता बढ़ाती है। गिलोय बीमारियों से लडऩे, उन्हें मिटाने और रोगी में शक्ति के संचरण में यह अपनी विशिष्ट भूमिका निभाती है।

इसका नियमित प्रयोग सभी प्रकार के बुखार, फ्लू, पेट कृमि, खून की कमी, निम्न रक्तचाप, दिल की कमजोरी, टीबी, मूत्र रोग, एलर्जी, पेट के रोग, मधुमेह, चर्म रोग आदि अनेक बीमारियों से बचाता है। गिलोय भूख भी बढ़ाती है। एक बार में गिलोय की लगभग 20 ग्राम मात्रा ली जा सकती है।

सत्व बनाने की विधि---

नीम के पेड़ पर चढ़ी गिलोय की बेल के छोटे छोटे टुकड़े कर लें, और सिल पर पीस लें। मिट्टी के वर्तन में पानी डाल कर 5-6 घंटे तक भिगो दें। फिर हाथों से मसल कर पानी छान लें। पानी भी 4-5 घंटे तक बरतन पड़ा रहने दें। गिलोय की सत्व को पानी निथार कर सत्व को धूप में रखें। यह सत्व अनेक रोगों को दूर करने में काम आता है ।

पंचामृत --- (1.) गिलोय-रस 10 से 20 मिलीग्राम, (2.) घृतकुमारी रस 10 से 20 मिलीग्राम, (3.) गेहूं का ज्वारा 10 से 20 मिलीग्राम, (4.) तुलसी-7-8 पत्ते, (5.) नीम के पत्ते 5-6 मिलाकर पञ्चामृत बनाया जाता है ।

गिलोय के लाभ

(1,) गिलोय की लता (बेल) को पीसकर प्रात खाली पेट पीने से रक्त सम्बन्धी विकारों में लाभ होता है ।

(2.) टॉक्सिन toxins--- इसके नियमित सेवन से शरीर में वर्त्तमान टॉक्सिन toxins बाहर आ जाते हैं ।

(3.) इससे शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ जाती है और व्यक्ति कम या नहीं के बराबर बीमार पडता है ।

(4.) जो लोग सप्ताह में कम-से-कम एक बार भी इसका काढा यदि पी लेते हैं तो भी उनके बीमार होने की संभावना कम ही रहती है ।

काढा बनाने की विधि---

गिलोय की 7-8 इंच लम्बी लता को काटकर साफ करके इसे कूट-पीसकर उसका रस निकाल लें । उसमें 7-8 तुलसी के पत्ते भी मिला लें । इसे पीने से गम्भीर बीमारियाँ तक भी ठीक हो जाती हैं । इससे कैंसर का रोग भी ठीक हो जाता है ।

(5.) ज्वर और दस्त--- इसका जूस पीने से ज्वर और दस्त में आराम मिलता है ।

सभी प्रकार के ज्वर गिलोय के साथ धनिया , नीम की छाल का आंतरिक भाग मिला कर काढ़ा बना लें। दिन में काढ़े की 2 बार सेवन करने से बुखार उतर जाएगा।

काला ज्वर----काला ज्वर- गिलोय के ताजे रस में शहद या मिस्री मिलाकर दिन में 3 बार देने से काला ज्वर में लाभ होता है।

(6.) पीलिया---पीलिया में 4-5 पत्ते और 5 इंच की लता को लेकर जूस निकाल कर हर एक दिन छोडकर पूरे 10 दिन पीने से पीलिया से छूकारा मिल जाता है । इसकी लताओं का काढा भी बनाकर पिया जा सकता है । जब काढा बनाएँ तो इसमें थोडी-सी देशी मिश्री भी मिला लें । मिश्री न हो तो देशी शक्कर , राब या देशी गुड ले सकते हैं ।

गिलोय की डंडी के साथ ; पुनर्नवा (साठी; जिसका गाँवों में साग भी खाते हैं) की जड़ भी कूटकर काढ़ा बनायें और पीयें, पीलिया में लाभ होगा ।

इसके लिए गिलोय का एक चम्मच चूर्ण, काली मिर्च अथवा त्रिफला का एक चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर चाटने से पीलिया रोग में लाभ होता है। या गिलोय के पत्तों को पीसकर उसका रस निकाल लें। एक चम्‍मच रस को एक गिलास मट्ठे में मिलाकर सुबह-सुबह पीने से पीलिया ठीक हो जाता है।


(7.) मधुमेह ---इसका रस या काढा मधुमेह (शूगर, डायबीटीज diabetes ) के रोग में लें, किन्तु इसमें मीठा कुछ भी न मिलाएँ ।
(8.) झुरियाँ---यदि चेहरे पर झुरियाँ पड रही हों तो इसकी बेल का पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाकर छोड दें । 20 मिनट बाद ठण्डे पानी से धो लें । ऐसा करने से झुरियाँ समाप्त हो जाती हैं ।

यदि आप जवान और स्वस्थ दिखना चाहते हैं, गम्भीर बीमारियों से दूर रहना चाहते हैं तो गिलोय का दैनिक जीवन में प्रतिदिन उपयोग करें । आपको लाभ होगा ।

(9.) पैरों में जलन---अगर पैरों में जलन होती है तो गिलोय के रस को नीम के पत्ते और आँवले के साथ मिलाकर काढा बनाकर प्रतिदिन 2-3 बार पीने से हाथों पैरों और शरीर की जलन दूर हो जाती है । सावधानी---इसका अधिक प्रयोग न करें, अन्यथा--खुजली हो सकती है । गर्भवती महिलाओं को इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए ।

पैरों के तलवों की जलन- गिलोय का चूर्ण, अरंडी का बीज पीस कर दही के साथ मिलाकर तलवों में लगाने से जलन मिट जाएगी।

इसके लिए गिलोय के रस को नीम के पत्ते एवं आंवला के साथ मिलाकर काढ़ा बना लें। प्रतिदिन 2 से 3 बार इस काढ़े का सेवन करें इससे हाथ पैरों और शरीर की जलन दूर हो जाती है।

(10.) बुखार---गिलोय के रस में शहद मिलाकर लेने से बार-बार होने वाला बुखार ठीक हो जाता है ।

(11.) तेज बुखार और खाँसी---गिलोय के रस में पीपल का चूर्ण और शहद मिलाकर लेने से तेज बुखार और खाँसी ठीक हो जाती है ।

(12.) मूत्रसम्बन्धी रोग---गिलोय के प्रयोग से मूत्र सम्बन्धी सभी रोग जड से समाप्त हो जाते हैं । जैसे---मूत्र का न आना, बूँद-2 आना, मूत्र के समय दर्द होना, पीला मूत्र होना, रुक-रुक कर आना, अधिक आना आदि बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं ।

(13) मोटापा कम करें---
गिलोय मोटापा कम करने में भी मदद करता है। मोटापा कम करने के लिए गिलोय और त्रिफला चूर्ण को सुबह और शाम शहद के साथ लें।

गिलोय, हरड़, बहेड़ा, और आंवला मिला कर काढ़ा बनाकर इसमें शिलाजीत मिलाकर पकाएं और सेवन करें। इस का नियमित सेवन से मोटापा रुक जाता है।

गिलोय, हरड, नागर मोथा चूर्ण को मधु (शहद) के साथ सेवन करने से मेदो रोग मोटापा मिटता है।

(14.) कैंसर---प्रथम गेहूँ के ज्वारे का रस निकाल लें । इसके बाद गिलोय को 7-8 इंच काट लें । इसमें 7-8 तुलसी के पत्ते और नीम की के 5-6 पत्ते भी मिला लें इन सबको पीसकर रस निकाल लें । इन सबको मिलाकर प्रातः रोज पीएं, लगभग एक वर्ष तक लगातार पीएँ । इससे प्रारम्भिक समय में होने वाला कैंसर समाप्त हो जाता है । गिलोय की जड़ें शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है। यह कैंसर की रोकथाम और उपचार में प्रयोग की जाती है।

(15.) मिर्गी--- गिलोय और पुनर्नवा मिर्गी में लाभप्रद होती है। इसे आवश्यकतानुसार अकेले या अन्य औषधियों के साथ दिया जाता है। अनेक रोगों में इसे पशुओं के रोगों में भी दिया जाता है।

(16.) बाँझपन---बाँझ नर या नारी को गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर खिलाने से वे बाँझपन से मुक्ति पा जाते हैं।

(17.) धडकन--- गिलोय तथा ब्राह्मी का मिश्रण सेवन करने से दिल की धड़कन को काबू में लाया जा सकता है। इसमें प्रचुर मात्रा में एन्टी आक्सीडेन्ट होते हैं।

(18.) गर्मी भगाने हेतु---शरीर में गर्मी अधिक है तो इसे कूटकर रात को भिगो दें और सवेरे मसलकर शहद या मिश्री मिलाकर पी लें ।

उल्टियां में फायदेमंद---
गर्मियों में कई लोगों को उल्‍टी की समस्‍या होती हैं। ऐसे लोगों के लिए भी गिलोय बहुत फायदेमंद होता है। इसके लिए गिलोय के रस में मिश्री या शहद मिलाकर दिन में दो बार पीने से गर्मी के कारण से आ रही उल्टी रूक जाती है।

(19.) platelets--- अगर platelets बहुत कम हो गए हैं , तो चिंता की बात नहीं , घृतकुमारी (एलुवीरा aloe vera) और गिलोय मिलाकर सेवन करने से एकदम platelets बढ़ते हैं ।

यदि गिलोय के साथ पपीते के 3-4 पत्ते मिलाकर रस बनाकर लेने से platelets- बढते हैं । यह platelets-के लिए अचूक औषधि है ।

(20.) दृष्टि की कमज़ोरी--- गिलोय का रस 10 मिली लीटर शहद या मिस्री के साथ सेवन कराएँ लाभ होगा।

आंखों के लिए फायदेमंद---
गिलोय का रस आंवले के रस के साथ मिलाकर लेना आंखों के रोगों के लिए लाभकारी होता है। इसके सेवन से आंखों के रोगों तो दूर होते ही है, साथ ही आंखों की रोशनी भी बढ़ती हैं। इसके लिए गिलोय के रस में त्रिफला को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े में पीपल का चूर्ण और शहद मिलकर सुबह-शाम सेवन करें।

गिलोय (गुडूची) स्वरस १२ मिली, मधु (शहद) २ ग्राम व सेंधा नमक १ ग्राम मिलाकर रखे व नियमित आंखों में अंजन से तिमिर, नेत्र-स्राव, नेत्र-शोध् आदि नेत्र विकार दूर होती है।

(21.) संधिवातः----- गिलोय का काढ़ा बनाकर उसमें 5 मिली. अरंडी का तेल मिलाकर सेवन करें। जटिल संधिवात दूर होगा।

(22.) हिचकी --- सोंठ और गिलोय का चूर्ण सुंघाएं। हिचकी दूर हो जाएगी।

(23.) कब्ज में- गिलोय का चूर्ण गुड़ के साथ सेवन करें। आराम मिलेगा।

(24.) कान दर्द में लाभकारी---
गिलोय के पत्तों के रस को गुनगुना करके कान में डालने से कान का दर्द ठीक होता है। साथ ही गिलोय को पानी में घिसकर और गुनगुना करके दोनों कानों में दिन में 2 बार डालने से कान का मैल निकल जाता है ।

गिलोय को घिस कर पानी में मिला कर गुनगुना कर लें। फिर कान में टपकाएं। दर्द दूर होगी और कान की मैल भी साफ होगी।

(25.) पेट के रोगों में लाभकारी
गिलोय के रस या गिलोय के रस में शहद मिलाकर सेवन करने से पेट से संबंधित सभी रोग ठीक हो जाते है। इसके साथ ही आप गिलोय और शतावरी को साथ पीस कर एक गिलास पानी में मिलाकर पकाएं। जब उबाल कर काढ़ा आधा रह जाये तो इस काढ़े को सुबह-शाम पीयें।

(26.) खुजली दूर भगाएं--
खुजली अक्‍सर रक्त विकार के कारण होती है। गिलोय के रस पीने से रक्त विकार दूर होकर खुजली से छुटकारा मिलता है। इसके लिए गिलोय के पत्तों को हल्दी के साथ पीसकर खुजली वाले स्थान पर लगाइए या सुबह-शाम गिलोय का रस शहद के साथ मिलाकर पीएं।

(27.) सर्प विष - सर्प विष में इसकी जड का रस या क्वाथ काटे हुए स्थान पर लगाया जाता है व आंखों में डाला जाता है व आधे-आधे घंटे की अवधि में पिलाया जाता है।

(28.) मन्दाग्नि---भूख न लगना, भोजन न पचना आदि में सौठ चूर्ण के साथ लेने पर मंदाग्नि दूर होती है।

(29.) पागलपन--ब्राह्मी के साथ इसका क्वाथ लेने से उन्माद दूर होता है।

(30.) टीबी---इलायची ; श्वेतद्ध, बंशलोचन व सत्व गिलोय मधु (शहद) के साथ लेने से क्षयरोग (टीबी) मिटता है।

(31.) श्वेत-प्रदर---शतावर के साथ इसका क्वाथ पिलाने से श्वेतप्रदर मिटता है।

गिलोय सत्व, आमलकी रसायन को गुडूची स्वरस में पीने से सभी प्रकार के प्रदर नष्ट होकर शरीर कांतिवान बनता है।


(32.) शक्ति बढाने हेतु--गिलोय, गोखरु, आंवला, मिश्री समान भाग मिलाकर १-१ चम्मच २ बार दूध् के साथ सेवन करने से शरीर में बहुत बल बढता है व बहुत उत्तम बाजीकरण रसायन है।

उत्तम बाजीकरण योग- गुडूची सत्व ६ ग्राम, बड का दूध् ३ ग्राम, मिश्री १२ ग्राम तीनों को मिलाकर प्रातः- सायं दोनों समय सेवन करें। वीर्य के समस्त विकार दूर होकर वीर्य (शुक्र) बढेगा एवं गाढा बनेगा।

(33.) रक्तचाप---गिलोय, ब्राह्मी, शंखपुष्पी चूर्ण को आंवले के मुरब्बे के साथ सेवन करने से रक्त चाप नियन्त्रित होता है।

(34.) भ्रम रोग---गुडूची, सौंठ, पिप्पलामूल, मुनक्का क्वाथ सेवन करने से भ्रम रोग दूर होता है।

(35.) बबासीर :----बबासीर दूर करे । मट्ठे के साथ गिलोय का 1 चम्मच चूर्ण सुबह शाम लेने से बवासीर में लाभ होता है।

(36.) मुंहासे दूर करे :--- मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयों पर गिलोय के फलों को पीसकर लगाये । मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयाँ दूर हो जाती हैं।

(37.) घाव---एक टेबल स्पून गिलोय का काढ़ा प्रतिदिन पीने से घाव भी ठीक होते है। गिलोय के काढ़े में अरण्डी का तेल मिलाकर पीने से चरम रोगों में लाभ मिलता है । खून साफ होता है और गठिया रोग भी ठीक हो जाता है।

(38) गठिया---गिलोय का चूर्ण, दूध के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से गठिया ठीक हो जाता है।

गिलोय और सोंठ सामान मात्रा में लेकर इसका काढ़ा बनाकर पीने से पुराने गठिया रोगों में लाभ मिलता है।

गिलोय का रस तथा त्रिफला आधा कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद पीने से घुटने के दर्द में लाभ होता है।

(39.) एनीमिया---खून की कमी---गिलोय ज्वर पीडि़तों के लिए अमृत है, गिलोय का सेवन ज्वर के बाद टॉनिक का काम करता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। शरीर में खून की कमी (एनीमिया) को दूर करता है।

(40.) बिवाई---फटी त्वचा के लिए गिलोय का तेल दूध में मिलाकर गर्म करके ठंडा करें। इस तेल को फटी त्वचा पर लगाए वातरक्त दोष दूर होकर त्वचा कोमल और साफ होती है।

थोड़ी सी आयुर्वेद मे श्रद्धा व समर्पण आपका तीन लाख का बजट बचा सकता है । इस बात का ध्यान रखें कि जब भी मौसम बदले तो गिलोय अवश्य लो ।

बच्चों को ऋतु परिवर्तन के समय अवश्य दो ।

बदलाव के समय विषाणु बहुत बढ़ते हैं – बच्चे कभी वाइरल ग्रस्त नहीं होंगे ।

आपको वाइरल का अंदेशा सा भी हो तो बिना झिझक के दो गोली तीन बार ले लो बुखार या तो मर जाएगा या बड़ा हल्का हो जाएगा ।



जुकाम में भी कारगर – कफ भी मिटती है – मोटापे मे भी लाभ – मोटापे मे इसके कडवे पत्ते खाओ -अनेकों रोगों मे लाभ – गरीब लोग किसी भी धर्म के हों इसे बड़ी मात्रा मे उगा के रखें – अपने आस पास के पार्कों मे भर दें – इतनी गिलोय हो कि भारत गिलोय का निर्याता बने ।
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